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पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(From Chandramaa to Jaleshwara)

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

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Chandramaa - Chandrashekhara ( words like Chandramaa / moon, Chandrarekhaa etc.)

Chandrashree - Champaka (Chandrasena, Chandrahaasa, Chandraangada, Chandrikaa, Chapahaani, Chapala, Chamasa, Champaka etc.)

Champaka - Chala (Champaa, Chara / variable, Charaka, Charana / feet, Charchikaa, Charma / skin, Charu, Chala / unstable etc. )

Chaakshusha - Chaamundaa  (Chaakshusha, Chaanakya, Chaanuura, Chaandaala, Chaaturmaasa, Chaandraayana, Chaamara, Chaamundaa etc.)

Chaamundaa - Chitta ( Chaaru, Chaarudeshna, Chikshura, Chit, Chiti, Chitta etc.)

Chitta - Chitraratha ( Chitta, Chitra / picture, Chitrakuuta, Chitragupta, Chitraratha etc. )

Chitraratha - Chitraangadaa ( Chitralekhaa, Chitrasena, Chitraa, Chitraangada etc. ) 

Chitraayudha - Chuudaalaa (Chintaa / worry, Chintaamani, Chiranjeeva / long-living, Chihna / signs, Chuudamani, Chuudaalaa etc.)

Chuudaalaa - Chori  ( Chuuli, Chedi, Chaitanya, Chaitra, Chaitraratha, Chora / thief etc.)

Chori - Chhandoga( Chola, Chyavana / seepage, Chhatra, Chhanda / meter, Chhandoga etc.)

Chhaaga - Jataa  (Chhaaga / goat, Chhaayaa / shadow, Chhidra / hole, Jagata / world, Jagati, Jataa / hair-lock etc.)

Jataa - Janaka ( Jataayu, Jathara / stomach, Jada, Jatu, Janaka etc.)

Janaka - Janmaashtami (Janapada / district, Janamejaya, Janaardana, Jantu / creature, Janma / birth, Janmaashtami etc.)

Janmaashtami - Jambu (Japa / recitation, Jamadagni, Jambuka, Jambu etc. ) 

Jambu - Jayadratha ( Jambha, Jaya / victory, Jayadratha etc.)

Jayadhwaja - Jara  ( Jayadhwaja, Jayanta, Jayanti, Jayaa, Jara / decay etc. )  

Jara - Jaleshwara ( Jaratkaaru, Jaraa / old age, Jaraasandha, Jala / water etc.)

 

 

 

Trishtup in somayaaga : Trishtup chhanda is associated with tapas/penances, summer season, seeing with a difference, thunderbolt, efficiency etc. The procedure of somayaaga throws much light on the nature of trishtup. Regarding efficiency, in the first stage of somayaaga, there is a fire called the fire of south, the fire of efficiency. The presiding deity of this fire is Nala Naishadha. From puraanic literature, we are familiar that king Nala does not know the art of gambling, but he is perfect in the art of tending horses. He loses in the game of gambling. Dr. Lakshmi Narayana Dhoot has rightly pointed out that what is gambling in mythology, that is the play of dice/chance in nature. In nature, nothing is definite, everything is a chance. So, in the first stage of somayaaga, chance is dominant. When one goes to the second stage of somayaaga, there this chance changes into more definiteness. There, south direction is the direction of efficiency, and as a proof of this, in this direction, the yaaga performer gives his senses to the priests as fee for yaaga and the priests return his senses to him after making these more efficient. Moreover, it seems that the south of first stage gets changed into north of second stage. In north, there is plenty of definiteness. Regarding south, there is famous story of demon king Raavana who was killed by lord Raama. The word Raavana itself seems to be symbolic of ‘rava’, the noise. Therefore, the main aspect of south direction is to increase efficiency by decrease in noise. The other name of Raavana is Dashaanana, one who is having 10 heads. The earlier form of word ‘dasha’/ten is ‘daksha’, efficiency. The game of gambling is also called Aksha vidya/the play of dice. This aksha symbolizes in modern sciences how the energy of the universe can be made to flow through a particular object. For example, take iron which makes all the magnetic forces around itself flow through it. When one is able to form an aksha, he can use it to plough a barren field. It seems that this act is symbolized in mythology by eyes, which are also called Akshi. Not only this, one is supposed to draw his eyes for inward seeing. This is symbolized in somayaaga by blindfolding a priest. How summer season can be correlated with trishtup, is yet to be investigated properly.

Jagati in Somayaaga : Jagati chhanda has been associated with rainy season, 3rd session of somayaaga, west direction, initiation, ears etc. Let us start from the gaarhpatya/home fire in the first stage. The presiding deity of this fire is god Yama, the ruler of hell. This home fire gets converted in the second stage into a place of sitting of priests. This place is also equivalent to stomach in the body. The duty of Yama is to rectify the noise which has cropped up while performing a work, to decrease the entropy of noise. The west direction has been associated with roasting the seeds of action, so that these may not fructify in future. How this can be done, is only a guess. May be this can be done by the act of initiation where a person sits in the womb of his preceptors, like in the womb of a mother. Thus he is protected from all sides. Before initiation, one is supposed to clean all his hair. This may mean that his aspiration for become introvert should be so strong that even hair do not grow, just as in the chemotherapy in the treatment of cancer where all hair fall. Moreover, it seems that one is supposed to leave the cruelty and become non- cruel. In puraanic stories of Akruura, it has been stated that rain takes place wherever he goes. Therefore, when rainy season is associated with jagati chhanda, it may mean that one has to leave cruelty to get rain of bliss. And this cruelty is nothing but that noise which has been generated while performing a work.  When jagati chhanda is said to be associated with ears, it may mean that at this stage, the direct flow of inner voice has stopped and one has to do with whatever has been heard earlier, or whatever heard by others. This is called Shruti and Smriti. The association of Jagati with the third session of somayaaga is justified on this basis because in this session, the yaaga is completed from the leftover of earlier two sessions. And in this third session, curd is also mixed with leftover soma. The curd may be symbolic of an enzyme which may make it easier to digest the leftover.

 

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सोमयाग में त्रिष्टुप् छन्द :    महावेदी में दक्षिण की मार्जालीय अग्नि का अपना विशेष महत्त्व होता है । प्राग्वंश में दक्षिण की अग्नि का नाम अन्वाहार्यपचन अग्नि है जो अर्धचन्द्राकार होती है और जिस पर ऋत्विजों हेतु ओदन आदि का पाक किया जाता है । इसका अधिपति नल होता है जो द्यूत में इतना पारङ्गत नहीं है । वह द्यूत में हार जाता है । कहा गया है कि नल अश्व विद्या जानता है, लेकिन अक्ष विद्या नहीं जानता, इसलिए द्यूत में हार जाता है । लेकिन नल भोजन पाक में, भोजन में रस उत्पन्न करने में समर्थ है । यह अक्ष विद्या क्या है, यह अन्यत्र ( विज्ञान भारती प्रदीपिका ) स्पष्ट किया जा चुका है । आधुनिक विज्ञान में अक्ष को चुम्बक के माध्यम से समझ सकते हैं । लोहे से बने चुम्बक  में आसपास की सारी चुम्बकीय धारा केन्द्रित हो जाती है । यदि किसी लोहे की छड पर धातु का तार लपेट कर उसमें विद्युत का प्रवाह किया जाए तो लोहा चुम्बक बन जाता है, अक्ष बन जाता है, उसमें आसपास की धारा को खींचने की क्षमता विकसित हो जाती है । इस चुम्बक से बहुत से कार्य लिए जा सकते हैं, जैसा कि आजकल विज्ञान में किया जा रहा है । इसके विपरीत अश्व विद्या फैलने की विद्या है ।

           महावेदी में स्थित मार्जालीय अग्नि इसी अन्वाहार्यपचन का रूप है या कोई अन्य विशिष्ट अग्नि है, यह अन्वेषणीय है । लेकिन सोमयाग की प्रक्रिया से ऐसा लगता है कि प्राग्वंश में गार्हपत्य अग्नि के उत्तर कोण में प्रवर्ग्य हेतु जो अग्नि का खर बनाया जाता है, प्रवर्ग्य प्रक्रिया समाप्त होने के पश्चात् इस खर की मृदा को उठाकर मार्जालीय धिष्ण्य में डालते हैं । अतः यह अनुमान लगाना चाहिए कि मार्जालीय अग्नि में प्रवर्ग्य खर के गुण होते हैं । संक्षेप में, प्रवर्ग्य इष्टि में प्रवर्ग्य खर पर महावीर संज्ञक मृत्तिका पात्र में उबलते हुए घृत में अज व गौ के दुग्ध का सिंचन करते हैं जिससे बडी  ऊंची ज्वालाएं उठती हैं । इस अग्नि की स्तुति की जाती है । यह प्रवर्ग्य संभवतः शरीर के रस के घर्म रूप, ज्वाला रूप बनने का प्रतीक है और स्तुति में इसे सूर्य व चन्द्र दोनों रूप दिए गए हैं । जब त्रिष्टुप् छन्द के विषय में कहा जाता है कि यह ग्रीष्म ऋतु से, तप से, वज्र से सम्बन्धित है, तो यहां तप का तात्पर्य घर्म उत्पन्न करने से लिया जा सकता है । त्रिष्टुप् को चक्षु रूप कहा गया है । कहा गया  है कि जो सुना है, वह सत्य नहीं होता, जो आंख से देखा गया है, वह सत्य है ( तैत्तिरीय ब्राह्मण )। वैदिक साहित्य में चक्षण से तात्पर्य संभवतः सूर्य और चन्द्रमा, २ प्रकार के चक्षण से है ( जैमिनीय ब्राह्मण १.७० का कथन है कि वाग् समुद्र है और मन समुद्र का चक्षण करता है । मन को चन्द्रमा से सम्बद्ध किया जाता है ) । लेकिन चक्षण के संदर्भ में उपरोक्त कथन संतुष्टि के लिए पर्याप्त नहीं लगते । इससे आगे के रहस्यों को जानने के लिए माध्यन्दिन सवन के कृत्यों पर दृष्टि डालनी होगी । माध्यन्दिन सवन में सोमाभिषव के पश्चात् ग्रावस्तुत नामक ऋत्विज अपनी  आंखों पर पट्टी बांधकर सोम का स्तवन करता है । कहा गया है कि यदि वह बिना पट्टी बांधे स्तवन करे तो उससे देवताओं में विष का संचार होता है । यह  आंखों पर पट्टी बांधना सम्यक् चक्षण के लिए अन्तर्मुखी होना हो सकता है । एक अन्य महत्त्वपूर्ण कृत्य वैश्वसृज होम या यजमान द्वारा ऋत्विजों को दक्षिणा दान है । दक्षता प्राप्त करने का काम अभी भी मार्जालीय अग्नि से लिया जाता है । इसीलिए माध्यन्दिन सवन में जब  यजमान अपने अङ्गों को निकाल कर ऋत्विजों को दक्षिणा रूप में देता है तो यह कार्य मार्जालीय अग्नि के समीप ही सम्पन्न होता है । दक्षता प्राप्ति के संदर्भ में पुराणों में दक्ष यज्ञ के विध्वंस की कथा उल्लेखनीय है ।

          दक्षता प्राप्ति के संदर्भ में एक बार फिर हमें आधुनिक भौतिक विज्ञान के इंजन की उपमा पर जाना होगा । आधुनिक विज्ञान के अनुसार ऐसा कोई इंजन नहीं है जो एक प्रकार की ऊर्जा को दूसरे प्रकार की ऊर्जा में शत प्रतिशत बदल सके । उदाहरण के लिए, विद्युतीय ऊर्जा का रूपान्तरण  यान्त्रिक ऊर्जा में किया जाता है । इस प्रक्रिया में ऐसा नहीं है कि विद्युतीय ऊर्जा १०० प्रतिशत यान्त्रिक ऊर्जा में बदल जाती हो । उसका एक भाग ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाता है । आवश्यकता इस बात की है कि इंजन की दक्षता में क्रमशः वृद्धि की जाए । वैदिक साहित्य में यह कार्य त्रिष्टुप् छन्द की क्रमिक प्रगति द्वारा दिखाया गया है । प्राग्वंश में दक्षिणाग्नि का अधिपति नल है जो जूए के कारण प्रसिद्ध है, वह जूआ भी खेलना नहीं जानता । डा. लक्ष्मीनारायण धूत के अनुसार जूए से तात्पर्य होता है कि इस संसार में जो घटनाएं घटित हो रही हैं, वह एक जूए के पांसों के रूप में हो रही हैं, वह घट भी सकती हैं, नहीं भी । लेकिन सोमयाग की महावेदी में आने पर दक्षता में वृद्धि हो जाती है । अतः किसी घटना का आकस्मिक रूप में घटित होना यहां समाप्तप्राय हो जाता है ।

सोमयाग में माध्यन्दिन सवन में ग्रावस्तुत ऋत्विज अपनी  आंखों पर पट्टी बांधकर ऋचाओं द्वारा स्तुति  करता है । ग्रावा सोम कूटने के पत्थरों को कहते हैं । वैदिक साहित्य में कहा गया है कि ग्रावाण: सोम कूटते समय शब्द करते हैं । एक ओर ग्रावाण: हैं तो दूसरी ओर रावण है । रव शोर को कहते हैं ।  हमारे अंदर कोई भी क्षोभ उत्पन्न हो, उसे रव कह सकते हैं । रव की दूसरी व्याख्या आधुनिक विज्ञान के आधार पर इस प्रकार कर सकते हैं कि कोई कार्य कितनी भी दक्षतापूर्वक क्यों न किया जाए, उसमें १०० प्रतिशत दक्षता नहीं लाई जा सकती । उस कार्य का कुछ न कुछ अंश बेकार चला जाता है । वह रव है । वह हमें अभिभूत कर लेता है । अपेक्षा इस बात की है कि वह रावा ग्रावा बने, सोम कूटने का पत्थर बने, वह व्यर्थ न जाने पाए । यही रावण का वध हो सकता है । यह दक्षता प्राप्त करने की दिशा है । रावण को सीता प्राप्त करने की कामना है । सीता पृथिवी का कर्षण करने से उत्पन्न होती  है । जहां पृथिवी का प्राण रूपी हल से कर्षण किया जा सकता है, उसे ग्राम्य प्रदेश कहते हैं । जहां  प्राण रूपी हल से पृथिवी का कर्षण नहीं किया जा सकता, उसे अरण्य कहते हैं ( शतपथ ब्राह्मण ) । राक्षस अरण्य में वास करते हैं । हल को वैदिक साहित्य में अक्षों में से एक कहा जाता है और त्रिष्टुप् छन्द की व्याख्या के संदर्भ में ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, अक्ष विद्या नल की कथा के माध्यम से अन्वाहार्यपचन अग्नि से और अन्वाहार्यपचन अग्नि त्रिष्टुप् छन्द से जुडी है । लेकिन इससे भी आगे समस्या यह है कि वैदिक साहित्य में त्रिष्टुप् को चक्षु से सम्बद्ध किया गया है । वैदिक साहित्य में प्रायः कहा जाता है कि अक्षियों में चक्षु विकसित करना है, कर्ण में श्रोत्र आदि( तैत्तिरीय आरण्यक आदि )। अतः अक्ष और अक्षियों से भी आगे चक्षु का विकास कैसे होगा, यह एक विचारणीय विषय है ।

          इस सवन में निष्पन्न किए जाने वाले कृत्यों में एक निष्केवल्य शस्त्र होता है और यह अनुमान लगा सकते हैं कि निष्केवल्य शस्त्र समाधि के समकक्ष कोई स्थिति हो सकती है । यह अनुमान लगाया जा सकता है कि माध्यन्दिन सवन में यजमान समाधि में प्रवेश और समाधि से व्युत्थान करता है और इस प्रकार उसे सम्यक् चक्षण की क्षमता प्राप्त होती है ।

सोमयाग में जगती छन्द :   पश्चिम दिशा में ऋत्विजों व यजमान के बैठनेv का स्थान होता है जिसे सदोमण्डप कहते हैं । सदोमण्डप की ६ धिष्ण्य संज्ञक अग्नियां प्रायः बुझी हुई अवस्था में रहती हैं और जब कभी आवश्यकता होती है, आग्नीध्र नामक उत्तर दिशा का ऋत्विज उन्हें अपनी अग्नि से प्रज्वलित करता है । इन अग्नियों के अधिपति मर्त्य और अमर्त्य स्तर से सम्बन्धित २ नामों वाले गन्धर्व होते हैं जिन्हें यह शाप मिला हुआ है कि उन्हें सोम प्राप्त नहीं होगा, केवल घृत की आहुति ही प्राप्त होगी । यज्ञ में इन ६ धिष्ण्य अग्नियों का नियन्त्रण मैत्रावरुण, होता, नेष्टा, पोता, अच्छावाक् आदि ऋत्विज करते हैं । सदोमण्डप में ही एक औदुम्बरी स्तम्भ होता है जो पृथिवी से निकलने वाली ऊर्क् का प्रतीक है और यह ऊर्क् अन्न रूप है । स्वयं सदोमण्डप उदर रूप होता है और इस प्रकार इस सदोमण्डप रूपी उदर की पूर्ति ऊर्क रूपी अन्न से होती है । यह पश्चिम दिशा का बहुत अच्छा उदाहरण है ।

          यह उल्लेखनीय है कि प्राग्वंश में उत्तर की अग्नि का अस्तित्व प्रायः नगण्य होता है । पूर्व में आहवनीय और पश्चिम में गार्हपत्य अग्नि होती है । गार्हपत्य अग्नि का अधिपति यम होता है और यम से स्पष्ट है कि प्राग्वंश की अवस्था में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि कर्मों के फल से बचा जा सके । यम द्वारा नियत कर्मों के फल को भोगना ही पडेगा ।

          प्राग्वंश की गार्हपत्य अग्नि और उत्तरवेदी के सदोमण्डप की तुलना उल्लेखनीय है । लगता है कि गार्हपत्य अग्नि का परिष्कृत रूप ही सदोमण्डप बना है ( पुष्टि के लिए देखें शतपथ ब्राह्मण ७.१.१.१०) । सोमयाग के आरम्भ में यजमान द्वारा दीक्षा ग्रहण की जाती है और यह कार्य गार्हपत्य अग्नि पर किया जाता है । ऐतरेय ब्राह्मण आदि में आता है कि सबसे पहले जगती सोम प्राप्ति के लिए गई लेकिन उसे अपने ४ अक्षरों में से ३ को खोना पडा और उसके साथ में दीक्षा भी जुड गई । अतः दीक्षा जगती का पहला रूप है जो गार्हपत्य पर सम्पन्न होता है । दीक्षा कृत्य में सबसे पहले नापित यजमान के पूरे शरीर के केशों का क्षौर कर्म करता है । फिर यजमान विभिन्न प्रकार की दीक्षाएं ग्रहण करता है । दीक्षा क्रम में वह कृष्णाजिन दीक्षा भी ग्रहण करता है । दीक्षा के माध्यम से यजमान विभिन्न प्रकार की योनियों में गर्भ रूप बनता है जिससे उसे कोई हानि न पहुंचा सके । उदाहरण के लिए, द्यौ सूर्य रूपी यजमान को गर्भ में धारण करती है, अन्तरिक्ष वायु रूपी यजमान को, पृथिवी अग्नि को, दिशाएं चन्द्रमा को आदि ( तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.७.७.२), पृथिवी सब भूतों को गर्भ में धारण करती है ( अथर्ववेद ५.२५) । गर्भ स्वयं की रक्षा करने में असमर्थ होता है, उसकी रक्षा अन्य करते हैं । दीक्षा क्रम में क्षौर कर्म से तात्पर्य अपनी चेतना को अन्तर्मुखी करने से हो सकता है - जहां केश, लोम भी बहिर्मुखी न होने पाएं । दीक्षा कर्म में पावमानी मन्त्रों का पाठ ( तैत्तिरीय ब्राह्मण १.४.८), गार्हपत्य अग्नि से विभिन्न पापों को दूर करने की प्रार्थना( तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.७.१२ ), व अरिष्टनेमि तार्क्ष्य की स्तुति ( सामवेद १.४.१.५.१) उल्लेखनीय हैं । दीक्षा के संदर्भ में ही अथर्ववेद ६.८१ में अश्वत्थ द्वारा शमी में गर्भ स्थापित किया जाता है ।

           द्वापर में कृष्ण द्वारा पश्चिम दिशा में द्वारका की स्थापना की कथा सर्वविदित है । द्वारका के संदर्भ में २ कथाएं महत्त्वपूर्ण हैं - एक तो अक्रूर द्वारा स्यमन्तक मणि का ग्रहण, अक्रूर के निवास से अनावृष्टि भय से मुक्ति व दूसरा मूसल द्वारा यादवों का नाश । अक्रूर के संदर्भ में वैदिक साहित्य में उल्लेख आता है कि अक्रूर चक्षु से देखे । यह स्थिति दीक्षा की स्थिति के लिए बहुत उपयुक्त है जहां गर्भ में स्थित हो जाने पर क्रूर चक्षु से देखने की संभावना नहीं रहती । जब तक क्रूरता रहेगी, आनन्द  की वर्षा नहीं होगी । इसके पीछे रहस्य यह हो सकता है कि हमारे शरीर में मूत्र व स्वेद के नि:सरण को भी वृष्टि का रूप माना जाता है । और आयु की दृष्टि से यह दोनों कर्म क्रूर कर्म हैं, इनसे आयु की हानि होती है । अमृतत्व के लिए यह अपेक्षित है कि न स्वेद का नि:सरण हो ( हनुमान की भांति )और न मूत्र का । तभी वास्तविक वृष्टि का साक्षात्कार हो सकता है । मूसल द्वारा यादवों के नाश को कर्म फल के नष्ट न होने की स्थिति समझा जा सकता है । इसके अतिरिक्त क्रूर कर्म को यज्ञ के एक अन्य कृत्य से भी समझा जा सकता है । सोम का सोमशकट में वहन करते समय यजमान - पत्नी शकट के धुरे व चक्रों के बीच आज्य लगाती है जिससे उनके घर्षण से क्रूर वाक् न निकले । अक्ष के केवल मुख भाग ही ऐसे हो सकते हैं जहां से ऊर्जा बाहर निकल सकती है और इस ऊर्जा का उपयोग  संसार रूपी चक्र में प्रवेश करने के लिए किया जाता है । इस सन्धि में क्रूरता नहीं आनी चाहिए । भौतिक विज्ञान के दक्षता के तन्त्र के उदाहरण में क्रूरता क्या है, यह ऊपर के वर्णन से सरलता से समझा जा सकता है । यह ऊर्जा रूपान्तरण में ऊर्जा का क्षय है ।

           तृतीय सवन को आर्भव पवमान कहा जाता है और इसमें मनुष्य से देव बने ऋभु गण का प्राधान्य कहा गया है । ऋभुओं पर अन्यत्र लिखी एक टिप्पणी में यह संकेत किया गया है कि ऋभु संभवतः ऋत् की ओर संकेत करते हैं । एक सत्य होता है, एक ऋत् । मर्त्य स्तर पर सत्य का साक्षात्कार नहीं हो सकता, ऋत् का हो सकता है । ऋत् का साक्षात्कार प्रायः खराब - अच्छे शकुनों के रूप में होता है । तृतीय सवन जगती छन्द से सम्बद्ध होता है, अतः परोक्ष रूप में शकुन - अपशकुन भी जगती से सम्बन्धित होने चाहिएं । और जब वैदिक साहित्य में प्रायः कहा जाता है कि जगती श्रोत्र से सम्बन्धित है, तो उसका अभिप्राय भी यही हो सकता है कि यह श्रुत ज्ञान को स्मार्त्त ज्ञान में रूपान्तरित करने में समर्थ है । जैसा कि ऋभुओं पर लिखी गई टिप्पणी में कहा गया है, सोमयाग में तृतीय सवन का आर्भव पवमान नाम होते हुए भी कहीं ऋभुओं का नाम नहीं आता, केवल ऋग्वेद के सूक्तों में इनकी देवरूप में स्तुति मिलती है । अतः ऐसा प्रतीत होता है कि ऋभुओं की स्थिति प्राप्त करना जगती छन्द की पराकाष्ठा है । ऋभुगण तीन ( ऋभु, विभु व वाज ) क्यों हैं, यह एक अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न है । हो सकता है कि ज्ञान, भावना व कर्म, या मन, प्राण और वाक् इन तीन स्तरों पर क्रूर ऊर्जा के अक्रूरता में बदलने की आवश्यकता पडती हो ।

          पुराणों में दक्ष यज्ञ के आख्यान में दक्ष श्मशानवासी शिव का अनादर करता है । अतः उसका यज्ञ नष्ट हो जाता है । यह श्मशान भी जगती से सम्बद्ध होना चाहिए ।

          जैसा कि त्रिष्टुप् के संदर्भ में ऊपर कहा गया है, एक इंजन द्वारा जब एक प्रकार की ऊर्जा का रूपान्तरण दूसरे प्रकार की ऊर्जा में होता है तो यह कार्य १०० प्रतिशत दक्षता वाला नहीं होता, ऊर्जा के कुछ भाग का क्षय ऊष्मा आदि के रूप में हो जाता है । जगती के संदर्भ में जगती को इस क्षय को प्राप्त हुई ऊर्जा माना जा सकता है जिसका किसी न किसी प्रकार से उद्धार करना है । ऐतरेय ब्राह्मण ३.४७ व ३.४८ के आधार पर यह माना जा सकता है कि चेतना के संदर्भ में चेतन मन से अचेतन मन की ओर जाना ही ऊर्जा का क्षय रूप है । जगती छन्द ऊर्जा के नष्ट हुए भाग से सम्बन्धित हो सकता है, इसका प्रमाण आर्भव पवमान नाम से पुकारे जाने वाले तृतीय सवन में मिलता है जो जगती छन्द से सम्बन्धित है । इस सवन में देवों को अर्पित करने के लिए सोम नहीं बचता, वह दूसरे सवन तक समाप्त हो जाता है । अतः सोमलता से सोम को निचोडने के बाद जो सोमलता या ऋजीष बचता है, उसमें मथित दधि मिलाकर उस जल का सोम के रूप में उपयोग किया जाता है । दधि मिलाने से क्या तात्पर्य हो सकता है, यह अन्वेषणीय है । कहा गया है कि दधाति इति दधि, अर्थात् जो ( घृत?) को धारण करता है, वह दधि है । शरीर के स्तर पर उदर में स्रवित होने वाला इन्सुलिन रस हमारे भोजन से प्राप्त अतिरिक्त ऊर्जा का भण्डारण कर देता है । अतः इसे भी दधि कहा जा सकता है । फिर जब हमारे शरीर को आवश्यकता होती है तो वह इस संचित ऊर्जा का उपयोग कर सकता है । इसी प्रकार यज्ञ के बारे में भी सोचा जा सकता है । वैदिक साहित्य में ऋजीष का बहुत महत्त्व है । ऋग्वेद की बहुत सी ऋचाओं में इन्द्र को ऋजीषी कहा गया है । ऋग्वेद ८.३२ सूक्त ऋजीषियों द्वारा किए जाने वाले कृत्यों का गुणगान करता है । सायण ने एक स्थान पर अपनी व्याख्या में इस शरीर को ही ऋजीष कहा है ।। इस शरीर को मृत्यु से बचाना और शरीर का पालन करना ही ऋजीष का कार्य है । सोमयाग के अन्त में ऋजीष को जल या आपः में प्रवाहित कर दिया जाता है । यहां प्रवाह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि ऐसा अनुमान है कि प्रवाहमान वस्तु पर प्रकृति के द्यूत का नियम न्यूनतम रूप में लागू होता है ।

          सोमयाग में तृतीय सवन में अन्तिम कृत्य हारियोजन ग्रह होता है । इस कृत्य में उन्नेता नामक ऋत्विज द्रोणकलश में सोमरस डालकर वौषट् सहित उसकी आहुतियां महावेदी की आहवनीय अग्नि में देता है । फिर उस द्रोणकलश में धान पकाकर उसका सब ऋत्विजगण भक्षण करते हैं ( चूंकि धान हरियों के लिए होता है, अतः ऋत्विजों को हरियों का रूप होना चाहिए ) । इसमें प्रयुक्त होने वाले मन्त्रों में योजा नु इन्द्र ते हरी का उल्लेख आता है । कहा गया है कि ऋक् व साम ही इन्द्र के २ हरि हैं । ब्राह्मण ग्रन्थों में सार्वत्रिक रूप से यह उल्लेख आता है कि यत् कर्म क्रियमाणम् ऋग् अभिवदति - अर्थात् ऋक् वह है जो किसी कर्म का सम्पादन करने से पूर्व ही कर्म का आभास करा देती है । जगती के संदर्भ में उपरोक्त वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है ।

          साहित्य में प्रायः गायत्री को पृथिवी व ८ वसुओं से, त्रिष्टुप् को अन्तरिक्ष व ११ रुद्रों से, जगती को द्युलोक व १२ आदित्यों से सम्बद्ध किया जाता है । हो सकता है कि यह उपरिवर्णित दिशाओं में भ्रमण की अपेक्षा ऊर्ध्वमुखी विकास की स्थिति हो । कहा गया है आदित्य जगती छन्द में भ्रमण करता है । इसका एक कारण यह दिया गया है कि चूंकि आदित्य के उदय होने पर जगत सक्रिय हो जाता है, जाग जाता है, इसलिए ऐसा कहा गया है । ऐसा संभव है कि कर्मों के फल का क्षय होने के पश्चात् ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती हो जब आदित्य उदित होता हो । आदित्य के उदय से तात्पर्य यह हो सकता है कि मर्त्य स्तर पर जीवन का सारा व्यापार बहुत मन्द गति से अग्रसर होने वाली चेतना द्वारा सम्पन्न होता है । यदि पैर के अंगूठे में चोट लग जाए तो मस्तिष्क तक उसकी सूचना पहुंचने में बहुत समय लग जाता है । आदित्य के उदित होने पर जीवन का व्यापार विद्युत की गति से चलने लगता है । तृतीय सवन का कृत्य अङ्गिरसों के उत्थान के लिए है । अङ्गिरस बहुत धीमी गति से प्रगति करने वाले प्राण हैं । आदित्य इन अङ्गिरस प्राणों को तीव्र गति प्रदान कर सकते हैं । अन्य स्थान पर कहा गया है कि जगती में एक किरण? शतधा सहस्रधा विभाजित हो सकती है । जैमिनीय ब्राह्मण १.२७२ में जगती को भूमा कहा गया है । अन्यत्र सार्वत्रिक रूप से जगती को वर्षा ऋतु के साथ सम्बद्ध किया जाता है । यह वर्षा भी आनन्द की वर्षा होनी चाहिए जिसका संकेत भूमा शब्द में मिलता है । बाह्य जगत में वर्षा किस प्रकार होती है, इससे हम परिचित ही हैं, लेकिन वैदिक कर्मकाण्ड में वर्षा के ५ स्तर गिनाएं गए हैं - पुरोवात को उत्पन्न करना, मेघों का संप्लावन, मेघों का गर्जन, विद्युत का चमकना और अन्त में वौषट् द्वारा मेघों का वर्षण । इस प्रकार जिस प्रकार से इन पांच स्तरों का संपादन किया जाएगा, उसी प्रकार की वर्षा होगी ।

सोमयाग में अनुष्टुप् छन्द :   सोमयाग के सदर्भ में अनुष्टुप् छन्द को समझने के लिए तृतीय सवन के पश्चात् यज्ञायज्ञीय स्तोत्र का गान उल्लेखनीय है । यद्यपि इस साम का मूल बृहती व सतोबृहती छन्दों में है, लेकिन जैमिनीय ब्राह्मण १.२८४ का कथन है कि सामगान के समय इसमें वाग् अक्षर जोड देने से यह अनुष्टुप् के समकक्ष बन जाता है । कहा जाता है कि यज्ञायज्ञीय गान के पश्चात् यजमान में वरदान देने की सामर्थ्य आ जाती है । अतः किसी की कामना पूर्ति का जो भी कार्य करना होता है, वह यजमान यज्ञायज्ञीय अग्निष्टोम साम के पश्चात् ही करता है । जैमिनीय ब्राह्मण १.२९९ का कथन है कि जहां गायत्र स्वारम् है, त्रैष्टुभ निधनवत् है, जागत साम ऐळम् है, वहीं आनुष्टुभ साम ऋक्सम प्राजापत्य है ।

          ऐतरेय ब्राह्मण ३.१३ में सोमयाग में प्रजापति के अनुष्टुप् छन्द को तीनों सवनों से मृत्यु को हटाने वाला कहा गया है । ऐसा कैसे हो सकता है ? अदिति को ब्राह्मण ग्रन्थों में उभयतःशीर्ष्णी वाक् कहा गया है । उभयतः शीर्ष का अर्थ यह दिया गया है कि जिसका पर व अपर न हो, दोनों सिरे परस्पर जुडे हों । लगता है कि यह स्थिति तभी आ सकती है जब वाक् परिक्रमा कर रही हो । ऋग्वेद १०.१३०.४ में सोम को अनुष्टुप् व उक्थों द्वारा महस्वान् होते कहा गया है । सोमयाग में यज्ञायज्ञीय सामगान के पश्चात् उक्थ स्तोत्र होते हैं और उक्थ का अर्थ सोए हुए प्राणों को जगाना लिया जा सकता है । तैत्तिरीय आरण्यक ३.९.१ में अनुष्टुप् को विष्णु की पत्नी कहा गया है ।

ब्राह्मणों में छन्दों के सामूहिक कथन : यह जानना महत्त्वपूर्ण होगा कि छन्दों के सामूहिक रूप से उल्लेख ब्राह्मण ग्रन्थों में कहां - कहां आए हैं । इस संदर्भ में शतपथ १.२.५.६, १.३.२.१६, ६.३.१.३८, १०.३.१.१, ११.५.९.७, १२.२.४.२, १२.३.४.३, १४.३.१.४, तैत्तिरीय ब्राह्मण १.५.१२.५, १.७.१०.३, २.६.१७.१, २.७.१५.५, ३.८.१२.१, तैत्तिरीय आरण्यक ३.९.१, ४.११.१, ५.५.१, ५.१२.१ आदि उल्लेखनीय हैं । शतपथ ब्राह्मण ८.६.२.६ में छन्दस्य इष्टकाओं की स्थापना का वर्णन विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है । इसमें छन्दस्य इष्टकाओं की स्थापना पुरुषाकार रूप में की जाती है । शिर में गायत्री, ग्रीवा में उष्णिक्, उर में त्रिष्टुप्, मध्य में स्वयमातृण्णा, पर्शुओं में बृहती, कीकसा में ककुप्, उदर में अतिच्छन्दा, श्रोणी में जगती, सक्थियों में अनुष्टुप्, पक्षों में पंक्ति आदि । ग्रीवा में उष्णिक् रखने के महत्त्व को समझने की आवश्यकता है । शिर को ग्रीवा के माध्यम से शरीर के शेष भाग से पृथक् कर दिया गया है जिससे सिर की विशेष स्थिति सुरक्षित रहे । लगभग सभी छन्दस्य इष्टकाओं की स्थापना स्वयमातृण्णा, केन्द्रीय प्राण के सापेक्ष की जाती है । जगती छन्द को श्रोणी में स्थान देकर यह स्पष्ट किया गया है कि जगती का कार्य मल से ऊर्जा का सम्पादन करना है । अतिच्छन्दा को अत्तिछन्दा कहा गया है जो अन्न का भक्षण करता है ।

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