Make your own free website on Tripod.com

पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(From Chandramaa to Jaleshwara)

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

Home page

Chandramaa - Chandrashekhara ( words like Chandramaa / moon, Chandrarekhaa etc.)

Chandrashree - Champaka (Chandrasena, Chandrahaasa, Chandraangada, Chandrikaa, Chapahaani, Chapala, Chamasa, Champaka etc.)

Champaka - Chala (Champaa, Chara / variable, Charaka, Charana / feet, Charchikaa, Charma / skin, Charu, Chala / unstable etc. )

Chaakshusha - Chaamundaa  (Chaakshusha, Chaanakya, Chaanuura, Chaandaala, Chaaturmaasa, Chaandraayana, Chaamara, Chaamundaa etc.)

Chaamundaa - Chitta ( Chaaru, Chaarudeshna, Chikshura, Chit, Chiti, Chitta etc.)

Chitta - Chitraratha ( Chitta, Chitra / picture, Chitrakuuta, Chitragupta, Chitraratha etc. )

Chitraratha - Chitraangadaa ( Chitralekhaa, Chitrasena, Chitraa, Chitraangada etc. ) 

Chitraayudha - Chuudaalaa (Chintaa / worry, Chintaamani, Chiranjeeva / long-living, Chihna / signs, Chuudamani, Chuudaalaa etc.)

Chuudaalaa - Chori  ( Chuuli, Chedi, Chaitanya, Chaitra, Chaitraratha, Chora / thief etc.)

Chori - Chhandoga( Chola, Chyavana / seepage, Chhatra, Chhanda / meter, Chhandoga etc.)

Chhaaga - Jataa  (Chhaaga / goat, Chhaayaa / shadow, Chhidra / hole, Jagata / world, Jagati, Jataa / hair-lock etc.)

Jataa - Janaka ( Jataayu, Jathara / stomach, Jada, Jatu, Janaka etc.)

Janaka - Janmaashtami (Janapada / district, Janamejaya, Janaardana, Jantu / creature, Janma / birth, Janmaashtami etc.)

Janmaashtami - Jambu (Japa / recitation, Jamadagni, Jambuka, Jambu etc. ) 

Jambu - Jayadratha ( Jambha, Jaya / victory, Jayadratha etc.)

Jayadhwaja - Jara  ( Jayadhwaja, Jayanta, Jayanti, Jayaa, Jara / decay etc. )  

Jara - Jaleshwara ( Jaratkaaru, Jaraa / old age, Jaraasandha, Jala / water etc.)

 

 

 

Short story of Jaraasandha/Jarasandha from Mahaabhaarata

Complete story of Jaraasandha from Mahaabhaarata

Jarasandha is an important character of Mahabharata which symbolizes the thought ‘I am body’ . This thought is the main cause of one’s fall. How this thought originates and how one can get rid of it, has beautifully been described in the story. Besides these two facts, one more fact of this thought – the loss that one bears in his whole life has also been described. The essence of these three aspects is as under:

          A man is a combination of two : pure consciousness and nature(Prakriti). Pure consciousness means our ‘aatma’ and nature means our gross and subtle bodies which actually are inanimate but become animate by taking consciousness from aatma (pure consciousness). Nature is an instrument for the manifestation of consciousness and it always changes. On the contrary, consciousness is eternal, it exists everytime everywhere and one’s existence is because of this. Thus, man is a blissful soul but as soon as he comes in this world, he is surrounded by ignorance and thinks himself as a body, not consciousness. In this story, this fact has been described through the birth of Jaraasandha.

          This thought that ‘I am a body’ is deeply rooted in one’s mind due to the long journey of mind( subtle body). Therefore, it is not easy to get rid of it. The story says that this thought can not be detached directly. If one wants to overcome this thought, it is essential to develop a combination of three powers – spiritual, mental and intellectual. These three powers have been symbolized by Krishna, Bheema and Arjuna. The method has also been described in the following sequence. First of all, try to understand all the aspects of this thought. This has been symbolized in the story by arrival of the trio near Jaraasandha. Second, put all the mental power constantly to this subject. This is indicated by the duel war between Jaraasandha and Bheema. Third, recognize both the aspects of nature separately. This is indicated by the tearing of Jaraasandha in two parts. Fourth, change the direction of one’s I(ego) from body to consciousness. This is indicated by throwing the two pieces of Jaraasandha in two opposite directions.

          A man bears a lot of loss due to this thought that I am a body. The body is mortal but the consciousness is eternal . Therefore, thinking himself as a body, man is always fearful of death. Besides this, many divine qualities such as equality, detachment, friendship, desirelessness, forgiveness, egolessness etc. always remain hidden in his personality and the man, being a part of eternal power feels himself poor and helpless to reach spiritual heights. This aspect is indicated in the story by imprisonment of kings by Jaraasandha.

          One more fact has also been pointed out in the story. Everybody knows that pure mind has capability to reflect the consciousness in full form. To gain this purity of mind, one has to remove all the impurities which lie in the form of desires and illusions. It is comparatively easy to conquer desires for a high moral mind(Yudhishthira) but very difficult to conquer illusions. This thought that I am a body is a great illusion. To gain the purity of mind, a high moral mind should try to get rid of this illusion with the help of spiritual, mental and intellectual powers. This act has been called ‘Rajasuuya sacrifice’ in the story. After performing this ‘raajasuuya’, one becomes a paramount sovereign.

- Radha Gupta

जरासन्ध की कथा का आध्यात्मिक विवेचन

राधा गुप्ता

जरासन्ध की उत्पत्ति एवं नाश की कथा महाभारत में सभापर्व के १४वें अध्याय से लेकर २४वें अध्याय तक वर्णित है । कथा का संक्षिप्त स्वरूप इस प्रकार है :

मगध देश में बृहद्रथ नाम के एक राजा थे । उन्होंने काशिराज की दो जुडवां कन्याओं के साथ विवाह किया परन्तु उन्हें पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई । एक बार चण्डकौशिक नामक मुनि अकस्मात् मगध देश में पधारे और उन्होंने राजा को पुत्र प्राप्ति कराने के उद्देश्य से एक फल प्रदान किया । राजा ने वह फल आधा - आधा करके अपनी दोनों पत्नियों को दे दिया । रानियों ने गर्भ धारण किया तथा यथासमय अपने - अपने गर्भ से शरीर का आधा - आधा टुकडा पैदा किया । शरीर के उन टुकडों को देखकर वे उद्विग्न हो गई तथा दोनों बहनों ने उन टुकडों को त्याग देने का विचार किया । रानियों की एक धाय गर्भ के उन टुकडों को अन्त:पुर से बारह चौराहे पर फेंककर चली गई । उधर से जा रही जरा नामक राक्षसी ने उन टुकडों को उठा लिया तथा सुविधापूर्वक ले जाने के उद्देश्य से जैसे ही उन टुकडों का संयोग हुआ, वैसे ही वह शरीरधारी शिशु बन गया । शिशु ने गम्भीर स्वर से रोना शुरु किया । रोने की आवाज को सुनकर राजमहल की स्त्रियां, स्वयं राजा बृहद्रथ तथा दोनों रानियां भी महल से बाहर निकल आई । राक्षसी ने राजा के घर में होने वाली अपनी पूजा तथा राजा - रानियों की मनःस्थिति पर विचार करते हुए मानवी रूप धारण करके उस शिशु को राजा को सौंप दिया । चूंकि जरा ने टुकडों को संधित किया था, इसीलिए राजा ने शिशु का नाम जरासंध रखा । जरासन्ध अत्यन्त प्रतापी था । अपने प्रताप के बल पर ही उसने अनेक राजाओं को अपने राज्य में बन्दी बना रखा था ।

          एक बार राजा युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ करने का विचार किया । सभी ने राजसूय यज्ञ हेतु युधिष्ठिर के विचार का अनुमोदन किया परन्तु श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को चेताया कि राजसूय यज्ञ में बाधक तत्त्व जरासन्ध है । वह महाप्रतापी है और उसने बहुत से राजाओं को भी कैद कर रखा है । अतः जब तक उसका नाश नहीं कर लिया जाता, तब तक राजसूय यज्ञ सफल नहीं हो सकता । जरासन्ध के महान् प्रताप को सुनकर युधिष्ठिर राजसूय यज्ञ करने के प्रति हतोत्साहित हुए, परन्तु भीम तथा अर्जुन द्वारा प्रोत्साहित करने पर पुनः यज्ञ सम्पादन हेतु तत्पर हो गए । जरासन्ध का नाश करने की रूपरेखा तैयार हुई । कृष्ण ने कहा कि जरासन्ध को सीधे पराक्रम द्वारा नहीं मारा जा सकता । उसका नाश करने के लिए नीति, बल तथा नीति, बल की संरक्षक शक्ति की समवेत आवश्यकता है । तदनुसार कृष्ण, भीम तथा अर्जुन ब्राह्मण का वेष धारण कर युक्तिपूर्वक जरासन्ध के समीप पहुंच गए । जरासन्ध की इच्छा के अनुरूप भीम के साथ जरासन्ध का महान् द्वन्द्व युद्ध हुआ । कृष्ण के संकेत से भीम ने जरासन्ध को पराजित कर दो टुकडों में फाड डाला । परन्तु दोनों टुकडे बार - बार जुड जाते और जरासन्ध जीवित हो उठता । अतः कृष्ण के संकेत के अनुसार भीम ने जरासन्ध के दो टुकडे करके उन्हें विपरीत दिशा में फेंक दिया । तब कहीं जाकर जरासन्ध का नाश हुआ ।

          सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने पर प्रस्तुत कथा गहन आध्यात्मिक तथ्य अपने गर्भ में छिपाए हुए है ।

          यह सर्वमान्य तथ्य है कि सत् चित् आनन्दघन चैतन्यात्मा प्रत्येक मनुष्य की हृदय गुहा में विराजमान है । ऊर्जा, ज्ञान और आनन्द रूपी प्रकाश की प्रखर किरणें उस आत्मा से निरन्तर उसी प्रकार प्रस्फुटित हो रही हैं, जैसे भौतिक जगत में सूर्य से प्रकाश और ऊर्जा का झरना सतत् बह रहा है । मनुष्य अपने सूक्ष्म शरीर( मन, बुद्धि, अहं) के द्वारा जो मनन - चिन्तन आदि करता है तथा स्थूल शरीर के द्वारा जो अनेकानेक क्रियाएं करता है, उन सबका एकमात्र आधार चैतन्यात्मा से प्रवाहित ऊर्जा ही है । परन्तु उस ऊर्जा का एक अत्यल्प अंश ही मनुष्य के उपयोग में आ रहा है । अधिकांश ऊर्जा के उपयोग से मनुष्य वंचित ही हो रहा है । इसका एकमात्र कारण मनुष्य स्वयं ही है । जैसे घने बादलों का टुकडा प्रखर सूर्य की किरणों को पृथ्वी तक नहीं आने देता, उसी प्रकार मनुष्य के मन के भ्रमपूर्ण संकल्प भी चैतन्यात्मा के ऊपर सघन आवरण बनकर उसे उसकी स्वयं की ही ऊर्जा से वंचित कर देते हैं । यदि मनुष्य यह चाहे कि वह अपनी ऊर्जा का अधिकाधिक उपयोग करे तथा अपनी वर्तमान दुःखपूर्ण अवस्था से ऊपर उठे, शास्त्रों की भाषा में - पार्थिव स्थिति से दिव्य स्थिति में जाना चाहे - तो यह आवश्यक ही नहीं, अपितु अपरिहार्य भी है कि वह मनुष्य चैतन्यात्मा के ऊपर छाए हुए सघन आवरण स्वरूप अपने ही मन के अज्ञानपूर्ण संकल्पों का नाश करके ज्ञानपूर्ण संकल्पों से अपने मन को ओतप्रोत करे । मनुष्य मन का सर्वाधिक अज्ञानपूर्ण संकल्प है - अपने आप को शरीर मात्र मान लेना । ऐसा मानकर मनुष्य 'मैं', 'मेरे' के मोह में बंधकर स्वार्थ के परवश हुआ अपनी असीमित ऊर्जा को सीमित कर लेता है । जरासन्ध की कहानी के माध्यम से महाभारतकार यही आध्यात्मिक तथ्य हम तक पहुंचा रहे हैं । साथ ही जरासन्ध की उत्पत्ति कथा के माध्यम से यह तथ्य भी सुस्पष्ट किया गया है कि आखिर यह भ्रमपूर्ण संकल्प आया कैसे ?

अब हम कहानी की प्रतीकात्मकता पर विचार करे ।

मगध देश का राजा बृहद्रथ हमारा मनुष्य शरीर है । मगध का अर्थ है - मग +धा । मग का अर्थ है आदान तथा धा का अर्थ है धारण करना । रथ कहते हैं शरीर को । मनुष्य शरीर अन्य जीवों के शरीर से श्रेष्ठ है, अतः बृहद्रथ है । इस बृहद्रथ रूपी मनुष्य शरीर की दो पत्नियां अपरा और परा प्रकृति हैं । अपरा प्रकृति का अर्थ है - पांच महाभूतों - आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी के स्थूल तत्त्वों से बना हुआ हमारा स्थूल शरीर तथा इन्हीं पांच महाभूतों के सूक्ष्म तत्त्वों से बना हुआ अहं, मन, बुद्धि रूपी सूक्ष्म शरीर । अपरा प्रकृति जड है । परा प्रकृति का अर्थ है - प्रकृति की वह शक्ति जो चैतन्यात्मा से चैतन्यता को ग्रहण करके उपर्युक्त अपरा प्रकृति को चेतनता प्रदान करती है । कहानी में इन्हें जुडवां कन्याएं कहा गया है क्योंकि चैतन्यात्मा रूपी काशिराज से इनका प्राकट्य एक साथ ही होता है । शिशु की उत्पत्ति में दोनों का बराबर - बराबर योगदान रहता है । चूंकि यह अपरा - परा प्रकृति गर्भ के भीतर शरीर का निर्माण करके उसे भीतर नहीं रखती, अपितु यथासमय शरीर से बाहर फेंकती है, इसलिए कल्पना की गई है कि मानों दोनों प्रकृतियों ने डरकर अपने - अपने अंश को बाहर फिंकवा दिया है । शिशु को गर्भ(अन्त:पुर) के भीतर से बाहर लाने वाली सहायिका शक्ति ही कहानी में धाय कही गई है । चौराहा बाह्य जगत् है । बाह्य जगत् में आते ही अज्ञानता रूपी जरा राक्षसी अपरा - परा प्रकृति के योगदान रूप उस शिशु को पकड लेती है । जरा का अर्थ है - जीर्ण, पुरानी । यह अज्ञानता बहुत पुरानी है, अतः इसका जरा नाम सार्थक ही है । इसी अज्ञानता के कारण सूक्ष्म शरीर का एक घटक अहं तत्त्व ( मैं का भाव) स्थूल शरीर के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेता है । परिणामस्वरूप 'मैं देह हूं' - यह संकल्प ही कहानी में जरासन्ध कहा गया है । जैसे - जैसे यह संकल्प दृढ होता जाता है ( कहानी में जरासन्ध का प्रतापी होना) , वैसे - वैसे यह हमारे उन गुणों( राजाओं) को अपने आधीन कर लेता है जो गुण 'मैं चैतन्य स्वरूप हूं' इस संकल्प के फलस्वरूप हमारे व्यक्तित्व में प्रकट होने थे । अभय, निरहंकार, समत्व, करुणा, मैत्री, अनुद्वेग, अनपेक्षा, असंग, क्षमा प्रभृति गुणों को 'मैं देह हूं' यह संकल्प रूपी जरासन्ध कैद कर लेता है । हमारे व्यक्तित्व में प्रस्फुटित नहीं होने देता । अतः इन गुण रूपी राजाओं को कैद से मुक्त कराने के लिए जरासन्ध का नाश आवश्यक है । इसीलिए प्रस्तुत कहानी में कृष्ण ने जरासन्ध के वध की अपरिहार्यता को निरूपित किया ।

          कहानी में यह भी कहा गया है कि युधिष्ठिर द्वारा सम्पादित होने वाले राजसूय यज्ञ की सफलता हेतु जरासन्ध का नाश आवश्यक है । राजसूय यज्ञ का अर्थ है - यज्ञकर्त्ता राजा द्वारा अपने चारों ओर स्थित राजाओं को आधीन करके उनके ऊपर स्वामित्व स्थापित करना और सम्राट् की उपाधि से विभूषित होना । अध्यात्म की दृष्टि से नाना प्रकार की कामनाएं, वासनाएं, इच्छाएं भी उन राजाओं के समान हैं जिनके उपर धार्मिक मन रूपी युधिष्ठिर को स्वामित्व स्थापित करना है । युधिष्ठिर हमारे ऐसे मन का प्रतीक है जो नैतिक धर्म - वरिष्ठों की यथायोग्य सेवा, कनिष्ठों को स्नेह, सभी का यथायोग्य सम्मान, सत्य वाणी का सदैव प्रयोग प्रभृति गुणों से ओतप्रोत है । ऐसे धर्मपूरित मन के लिए कामनाओं, वासनाओं पर स्वामित्व स्थापित करना कठिन नहीं है परन्तु दिव्यता के सोपानों पर चढने के लिए स्वयं को देहमात्र मानने के संकल्प से हटना कठिन है । इसीलिए कहानी में कहा गया है कि कृष्ण द्वारा जरासन्ध का नाश करने की बात सुनकर युधिष्ठिर यज्ञ करने के प्रति हतोत्साहित हुए ।

          'मैं देह हूं' मन के इस संकल्प रूपी जरासन्ध का विनाश प्रत्यक्ष आक्रमण द्वारा सम्भव नहीं है । इसको मारने के लिए युक्ति, बल और संकल्प की समवेत आवश्यकता है । इन तीनों को कहानी में कृष्ण, भीम तथा अर्जुन कहा गया है । जरासन्ध के साथ भीम का द्वन्द्व युद्ध यह इंगित करता है कि मन के ऐसे संकल्प को समाप्त करने के लिए मन के ही विशिष्ट बल को - ऐसा मन जो कृष्ण आश्रित हो - सतत् लगे रहना पडता है , तब कहीं जाकर उसका नाश होता है ।

          कृष्ण के द्वारा जरासन्ध को दो टुकडों में चीरने का संकेत यह इंगित करता है कि 'मैं देह हूं' इस संकल्प का निर्माण अज्ञानतावश अपरा - परा प्रकृति के तादात्म्य से होता है, अतः इससे मुक्त होने के लिए इन दोनों प्रकृतियों को पृथक् - पृथक् करके पहचानने का प्रयत्न करना चाहिए । अपरा - परा दोनों प्रकृतियां मनुष्य के पास उपकरण स्वरूप हैं जिसकी सहायता से मनुष्य की चैतन्यरूपता अभिव्यक्त होती है । प्रकृति स्वयं चैतन्य रूप नहीं है । अपनी प्रकृति की उपकरणरूपता भलीभांति पहचान लेने पर मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को जानने में समर्थ होता है ।

          कहानी में कहा गया है कि जरासन्ध को दो टुकडों में चीर देने पर भी वे टुकडे पुनः - पुनः  जुड जाते और जरासन्ध जीवित हो उठता । अतः कृष्ण ने दोनों टुकडों को विपरीत दिशा में फेंकने का संकेत किया, जिससे जरासन्ध पुनः जीवित न हो सका । इसका तात्पर्य यह है कि अपनी दोनों प्रकृतियों अपरा - परा को पृथक् - पृथक् करके पहचान लेने पर भी देह के संकल्प का समूल नाश नहीं हो पाता । समूल नाश हेतु मन के संकल्प का दिशा परिवर्तन आवश्यक है । अपने 'मैं ' की दिशा यदि देह से मोडकर चैतन्यात्मा की ओर कर दी जाए , अथवा सरल शब्दों में कहें तो मन को देह के पोषक स्वार्थपूर्ण कार्यों से हटाने के साथ - साथ चैतन्य के पोषक परमार्थ कार्यों से जोड दिया जाए, तो जरासन्ध रूपी देह संकल्प का समूल नाश हो जाएगा । एक दिशा से तोडने के साथ - साथ दूसरी दिशा से जोडना भी आवश्यक है । दैनिक जीवन में हम यह भूल बार - बार करते हैं कि मन की किसी आदत को तोडने का प्रयत्न तो बार - बार करते हैं, परन्तु मन को किसी दूसरी आदत से जोडते नहीं हैं । इसलिए बार - बार तोडने पर भी मन की वह आदत पुनः - पुनः उत्पन्न हो जाती है ।